प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक को
अंदाज़ा है कि अगर पटवारी अड़ंगा लगा दे तो कीचड़ में फँसे विकास रथ को भी
कोई निकाल नहीं पाएगा. इसीलिए उन्होंने लखनऊ में कहा कि मुल्क को या तो
प्रधानमंत्री चलाता है या पटवारी.
पटवारी को तो हमेशा अपनी ताक़त का एहसास था ही. उसे मालूम था कि अगर उसकी कृपा नहीं हुई तो तहसील की फ़ाइल
जाम की जा सकती है. पर पिछले कई दशकों में पहली बार किसी प्रधानमंत्री को
अपनी ताक़त का एहसास हुआ है बल्कि वो मंच से ऐलान भी करता है कि हमारे पास "इरादा भी है और ताक़त भी".
जो बात पटवारी को सरकारी ओहदे के कारण
मालूम थी अब पूर्ण बहुमत वाले प्रधानमंत्री को भी उस ताक़त का एहसास हो गया
है. वरना मोदी चड़ी सरकारें चलानेसे पहले खिचड़ी सरकारें चलाने की थकावट तमाम
प्रधानमंत्रियों के चेहरे पर नज़र आती थी.
ख़ैर है कि अपना अब तक किसी प्रधानमंत्री से कोई वास्ता नहीं पड़ा. दूर-दूर से देखा-देखी तो वीपी
सिंह, एचडी देवेगौड़ा, पीवी नरसिंहाराव से ज़रूर हुई है मगर उस ज़ोन की
दीवार को हम जैसे पत्रकार कभी भेद ही नहीं पाते जहाँ प्रधानमंत्री पास
बिठाकर पूछें कि कैसे हो?
पर एक पटवारी ने एक बार इस क़दर छकाया और थकाया कि आज तक उसका ख़्याल आने पर साँस चढ़ने लगती है.
पर पटवारी से पहले बात प्रधानमंत्रियों के स्नेह-ज़ोन की जहाँ तक पहुँचने के लिए बहुत पहले से मशक्कत करनी पड़ती है. ऐसे नेताओं के बरामदों
में बैठकर घंटों इंतज़ार करना पड़ता है जिनमें प्रधानमंत्री बनने की
संभावनाएँ देखी जा रही होती हैं. 'देशवासियों को आप क्या संदेश देना
चाहेंगे' टाइप के सवालों से भरपूर इंटरव्यू करने पड़ते हैं, ये साबित करना
पड़ता है कि हम आप ही की कोटरी के हैं, ग़ैर ना समझ लेना.
कई नामचीन पत्रकारों को आप आज भी प्रभावशाली नेताओं के बरामदे में इंतज़ार करते हुए देख सकते हैं.
किसी
दौर में अटल बिहारी वाजपेयी के घर फ़ोन करना होता था तो वो आसानी से फ़ोन
पर आ जाते थे और खुल कर बात करते थे. कभी किसी सभा-समारोह में मिल जाते थे
तो ठठा कर हँसते, और कई बार सीधा सवाल पूछने पर तुनक भी जाते थे.
तुनके
वो तब थे जब वो लखनऊ लोकसभा क्षेत्र से 1999 के आम चुनावों में पर्चा दाख़िल करने गए थे. उस दौर में भी बीजेपी के कुछ बयानवीर महात्मा गाँधी को
निशाने पर ले लिया करते थे. ऐसे ही किसी नेता ने कह दिया कि भारत का कोई
राष्ट्रपिता नहीं हो सकता.
पर्चा दाख़िल करके निकल रहे प्रधानमंत्री वाजपेयी को भीड़ के बीच रोककर मैंने यही सवाल पूछ लिया. एक बार उन्होंने
ही तो कहा था कि गाँधीवादी समाजवाद बीजेपी की विचारधारा है. हिंदुत्व,
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसे शब्द तब फ़ैशन में नहीं आए थे. इसलिए जब उन्हीं
की पार्टी के लोग कह रहे हों कि भारत का कोई राष्ट्रपिता नहीं हो सकता तो
सवाल तो पूछा ही जाना चाहिए था.
सवाल पर वो अचकचाए फिर दो पल को आँखें बंद करके बोले - जब देश का राष्ट्रपति हो सकता है तो राष्ट्रपिता होने में क्या बुराई है? र उन्हें तुरंत समझ में आ गया कि पत्रकार हेडलाइन तलाश रहा है, और वो तमकते हुए अँग्रेज़ी में बोले - बट, दिस इज़ ए लोडेड क्वेश्चन. यानी ये मासूमियत से किया गया सवाल नहीं है बल्कि इसके निहितार्थ हैं. वो नाराज़
दिख रहे थे.
पर मई 1996 में जब वो पहली बार 13 दिन के लिए प्रधानमंत्री बने उस वक़्त पाकिस्तान में बेनज़ीर भुट्टो प्रधानमंत्री थीं.
उस शाम 11 अशोक रोड के भारतीय जनता पार्टी के दफ़्तर में शाम को आलीशान
प्रेस कॉन्फ़्रेंस की गई. आज स्वीकार करना पड़ेगा कि मेरे सवाल में शरारत का पुट छिपा था. मैंने सबसे अंत में उनसे पूछा: "अटल जी, आज की रात आप पड़ोसी मुल्क की अपनी (फिर मैं थोड़ा रुका) काउंटरपार्ट को क्या संदेश
भेजने जा रहे हैं?"
चिरकुँआरे अटल बिहारी वाजपेयी मेरा वाक्य होने से पहले ही समझ गए कि सवाल कहाँ जाकर गिरा है और दिल खोलकर हँसे. उनके साथ
पूरा मीडिया हँसा. लेकिन फिर कुछ देर बाद उन्होंने गंभीर होकर
भारत-पाकिस्तान रिश्तों के बारे में अपना नज़रिया सामने रखा.
अब ऐसा
मज़ाकिया सवाल - या फिर कोई गंभीर सवाल - किससे पूछा जाए? सोचते हुए भी
झुरझुरी होती है. प्रधानमंत्री खुली प्रेस कॉनफ़्रेंस करते नहीं. साल में
ज़रूर एक बार कुछ पत्रकार उनसे मिलते हैं और कुछ देर बाद बीजेपी दफ़्तर से
हँसते-गाते निकलते हैं - 'सेल्फ़ी लेल्ली रे!'