集约化养殖对人类、动物、乃至我们的地球来说可谓是毫无益处。这是10月5日-6日在伦敦召开的“物种灭绝及牲畜会议” ( )上传达出来的强有力的信息。
作为一个有着50年历史的压力集团(通过政治施压谋求特定利益的团体),此次会议的主办方世界农场动物福利组织( )一直不鼓励发展工业化农业模式,而是积极倡导在生态农业的基础上建立一个“生机勃勃的粮食系统”,以及不断提高“植物性食物”在人类膳食结构中的比例。
这么做的理由很充分:目前的粮食系统除了浪费严重,还用大量可供人类食用的作物喂养牲畜。粮食分配也极为不均:一方面,富裕国家的人民食不厌精,并因此患上很多非传染性的富贵病;另一方面,贫困国家的人们却食不果腹,营养不良。
这样的粮食系统不仅导致生物多样性丧失、土壤退化、抗生素耐药、生物地球化学循环受到干扰,更是导致气候变化最显著的原因之一。同时,这样的粮食系统也是残酷的,因为它在很多情况下无视最基本的动物福利原则。
不过让人感到奇怪的是,这次会议上很多对话都是围绕人口增长展开的。会议首日一大早,一位与会者就表示,小组讨论应将人口作为导致环境变化的因素之一加以重点讨论。很多人似乎也认同这一观点,尽管主办方 的目标是结束粮食分配不均,和马尔萨斯的“人口增长导致贫困和环境恶化”的理论并无必然联系。
很快,大多数与会者就指出,减缓人口增长最有效的方法就是保护妇女权利、提高妇女受教育程度。其中一个讨论小组的主席、前英国政治家、环保人士史坦利·约翰逊提出应维护妇女的平等权益,并讲述了他最近一次访问印度时的感受,认为需要加强计划生育教育的不止是女性,男性同样也有必要。
不得不说,约翰逊自己就有六个子女,而且他所在的讨论小组全部都是男性成员。所以,小组讨论最后也像大多数人口增长问题的讨论一样:一群有钱的西方精英男围坐在一起,对女性的生育选择权指手画脚。
当然,不论人口增长的环境后果如何,所有男性都应支持妇女平权。但是,他们应当从本国做起,拿自己开刀(包括从他们所在的讨论小组做起),而不是插手海外其他国家和地区的生育权问题,因为这很快就会被看作是一种侵略性的举动,甚至更糟。
此外,诸如少生孩子、多吃菜这种应对环境问题的简单办法并不能解决粮食系统所面临的问题。这个系统中,粮食安全、贫富不均、环境污染、农民生计、动物福祉等问题错综复杂,牵一发而动全身。
相反,同样在会议首日发言的拉杰·帕特尔对这个问题的看法却更加透彻,认识到了目前粮食系统的残酷、不公和破坏性。
帕特尔既是一名学者,也是一位活动家。在这次会议上,他发表了自己有关“廉价自然”的论文:“廉价自然”相当于一个低消费系统里,在这里廉价食物的存在可以为过着贫瘠生活的低收入劳动者提供补给——这些人之所以过着这种“廉价的生活”,与原住民土地被侵占、自然资源被掠夺不无关系。帕特尔也同时在论文中解释了美国粮食系统中有色人种是如何在最危险、最糟糕的条件下工作的。
总之,他在论文中对复杂的粮食系统进行了详尽地分析。他的观点虽说不像马尔萨斯的人口环境论那样悲观,但也绝不乐观。技术或资本主义制度并不能给予我们取之不尽用之不竭的粮食,但是消除贫富差距、拯救环境、停止残酷的牲畜豢养方式这些富有建设性的行动,却能共同改变我们种植粮食、摄入食物的方式。
粮食问题不适合化繁为简,相反,只有充分发掘其复杂性才能帮助我们解决它。
Wednesday, September 19, 2018
Thursday, September 13, 2018
अमीर, खुशहाल और उदार स्वीडन क्यों बदल रहा है?
रोप के देश स्वीडन का जिक्र हो तो आपके ज़हन में क्या कुछ आता है?
अल्फ्रेड नोबेले, नोबेल पुरस्कार, डायनामाइट, बोफोर्स, कंप्यूटर माउस, फुटबॉल टीम या फिर म्यूजिकल बैंड एबा?
आपके दिमाग में इस देश की चाहे जो पहचान दर्ज़ हो, वहां के लोग तो अर्से से अपने समाज के खुलेपन, लैंगिक समानता और राजनीति के उदार चरित्र पर इतराते रहे हैं.हां सरकारें लोगों की ज़िंदगी में झांकती नहीं बल्कि समाज कल्याण, स्वास्थ्य सुविधाओं और पारदर्शिता तय करने में जुटी दिखती हैं.
हथियार निर्यात करने के मामले में आला देशों की कतार में होने के बाद भी स्वीडन ने साल 1814 के बाद कोई जंग नहीं लड़ी है.
बिशप फ़्रैंको मुलक्कल जालंधर के सेक्रेड हार्ट कैथोलिक चर्च में रहते हैं और ये उनका धार्मिक अधिकार क्षेत्र भी है.
बीबीसी से ख़ास बातचीत में बिशप मुलक्कल ने दावा किया कि उनके ख़िलाफ़ लगे सभी आरोप झूठे हैं.
उन्होंने कहा, "मेरे ख़िलाफ़ जो आरोप हैं, वो सिर्फ़ झूठी कहानियाँ हैं. उनमें कोई सच्चाई नहीं है. शिकायतकर्ता एक वयस्क महिला है. ऐसा कैसे हो सकता है कि एक महिला के साथ कोई इतनी बार और इतने लंबे समय तक लगातार रेप करे."
जबकि केरल में पुलिस को जो शिकायत मिली है उसमें नन ने ये दावा किया है कि मई 2014 से लेकर सितंबर 2016 के बीच बिशप फ़्रैंको मुलक्कल ने कई बार उनका यौन शोषण किया.
किसी भी चर्च के धार्मिक अधिकार क्षेत्र में एक बिशप सबसे बड़ा पदाधिकारी होता है. भारत में इस वक़्त कुल 145 बिशप हैं.
इस मामले में जालंधर के बिशप का ये भी दावा है कि नन के ख़िलाफ़ एक अलग शिकायत में उन्होंने जाँच की थी जिसके बाद नन पर कार्रवाई भी हुई थी. उसी का बदला लेने के लिए वो ऐसा कर रही है.
इस बीच, केरल में नन महिलाओं के एक समूह ने इस मामले पर पुलिस की निष्क्रियता के ख़िलाफ़ सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन आयोजित किये हैं. वहीं दूसरी ओर, जालंधर स्थित संस्था मिशनरी ऑफ़ जीसस ने कोच्चि में सभी ननों से इन विरोध प्रदर्शनों में शामिल न होने का आग्रह किया है.
केरल में हुए विरोध प्रदर्शनों में कैथोलिक लैटिन चर्च के सदस्यों समेत कई स्थानीय लोगों ने भी हिस्सा लिया.
शिकायतकर्ता का कहना है कि 28 जून 2018 को पुलिस में शिकायत दर्ज कराने से पहले उन्होंने चर्च के बड़े अधिकारियों से बिशप फ़्रैंको मुलक्कल के ख़िलाफ़ बलात्कार के आरोपों की चर्चा की थी, लेकिन नन का आरोप है कि किसी ने उनकी नहीं सुनी.
शिकायतकर्ता नन का कहना है कि सार्वजनिक तौर पर विरोध प्रदर्शन करने से पहले उन्होंने जनवरी, जून और सितंबर में दिल्ली में बैठने वाले पोप के प्रतिनिधियों को भी चिट्ठी लिखी थी.
केरल कैथोलिक चर्च सुधार आंदोलन के जॉर्ज जोसेफ़ ने इस मामले में पुलिस की निष्क्रियता के ख़िलाफ़ केरल के उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी.
जब जोसेफ़ की याचिका पर कोर्ट में 10 अगस्त को सुनवाई हुई तब पुलिस ने कोर्ट को बताया था कि उसे नन के आरोपों के पक्ष में कुछ सबूत मिले हैं, जिसके बाद कोर्ट ने पुलिस को इस मामले में सावधानी से काम करने को कहा था.
जॉर्ज जोसेफ़ ने चार प्राथमिक बिंदुओं पर अदालत से निर्देश देने की प्रार्थना की है.
बीबीसी से बातचीत में जॉर्ज जोसेफ़ ने कहा, "हम चाहते हैं कि बिशप को जल्द से जल्द गिरफ़्तार किया जाये. इस मामले की पुलिस जाँच हाई कोर्ट की निगरानी में हो. बिशप फ़्रैंको मुलक्कल के विदेश यात्रा करने पर प्रतिबंध लगे और यौन दुर्व्यवहार के पीड़ितों के लिए गवाह सुरक्षा प्रोटोकॉल तैयार किया जाये."
वहीं अपने बचाव में बिशप फ़्रैंको मुलक्कल कहते हैं कि नन का पारिवारिक जीवन काफ़ी पेचीदा रहा है. वो एक पुरुष के साथ रिलेशन में थीं जो अब भी उनका पति है. इस मामले की जाँच की जा रही थी. लेकिन पूछताछ से ध्यान भटकाने के लिए नन ने उनके ख़िलाफ़ आधारहीन आरोप लगा दिये.
कोच्चि में हुए एक विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाली सिस्टर अनुपमा इसका जवाब देती हैं. उनका कहना है, "यहाँ उल्टा पीड़िता के ख़िलाफ़ ही बेबुनियाद आरोप गढ़े जा रहे हैं. जब महिला ने अपना घर छोड़ दिया था तो उनका परिवार साथ कैसे हो सकता है. बिशप ने ही इस जोड़े पर दबाव बनाकर दोनों से एक पत्र पर हस्ताक्षर कराये थे."
इस बीच बिशप के ख़िलाफ़ हो रहे विरोध प्रदर्शनों को समाज के अन्य वर्गों का भी समर्थन प्राप्त हो रहा है.
इनके समर्थन में प्रदर्शन में शामिल केरल हाईकोर्ट के सेवानिवृत जज कमाल पाशा ने बीबीसी से कहा, "पुलिस को अब तक अभियुक्त को हिरासत में लेना चाहिए. हाईकोर्ट के सामने जाँच अधिकारी ने जो एफ़िडेविट दाख़िल किया है, उसके मुताबिक़ बिशप को हिरासत में लेने के लिए पर्याप्त सबूत हैं."
"मुझे लगता है कि इस मामले में नन का साथ देना चाहिए. वे लोग अभियुक्त को बचाने की कोशिश कर रहे हैं. उसने अभी तक अग्रिम ज़मानत की याचिका भी दाख़िल नहीं की है."
पेशे से वकील और चर्च सुधार आंदोलन की सदस्य इंदुलेखा जोसेफ़ कहती हैं, "समस्या ये है कि ना तो सरकार और विपक्ष, दोनों में से कोई भी इस मुद्दे पर बोल नहीं रहा है क्योंकि सबको वोट बैंक की राजनीति करनी है. लोगों को लगता है कि बिशप का मतदाताओं पर प्रभाव है."
सायरो मालाबार चर्च के पूर्व प्रवक्ता फ़ादर पॉल थेलाकाठ ने बताया है, "शर्मनाक चुप्पी है, नन की शिकायत को कई महीने बीत चुके हैं. उन्होंने पुलिस के पास भी शिकायत की थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई."
फ़ादर थेलाकाठ ने बताया, "कोई फ़ैसला नहीं सुना रहा है कि कौन सही है और कौन ग़लत. लेकिन चुप्पी पीड़ादायक है."
अल्फ्रेड नोबेले, नोबेल पुरस्कार, डायनामाइट, बोफोर्स, कंप्यूटर माउस, फुटबॉल टीम या फिर म्यूजिकल बैंड एबा?
आपके दिमाग में इस देश की चाहे जो पहचान दर्ज़ हो, वहां के लोग तो अर्से से अपने समाज के खुलेपन, लैंगिक समानता और राजनीति के उदार चरित्र पर इतराते रहे हैं.हां सरकारें लोगों की ज़िंदगी में झांकती नहीं बल्कि समाज कल्याण, स्वास्थ्य सुविधाओं और पारदर्शिता तय करने में जुटी दिखती हैं.
हथियार निर्यात करने के मामले में आला देशों की कतार में होने के बाद भी स्वीडन ने साल 1814 के बाद कोई जंग नहीं लड़ी है.
बिशप फ़्रैंको मुलक्कल जालंधर के सेक्रेड हार्ट कैथोलिक चर्च में रहते हैं और ये उनका धार्मिक अधिकार क्षेत्र भी है.
बीबीसी से ख़ास बातचीत में बिशप मुलक्कल ने दावा किया कि उनके ख़िलाफ़ लगे सभी आरोप झूठे हैं.
उन्होंने कहा, "मेरे ख़िलाफ़ जो आरोप हैं, वो सिर्फ़ झूठी कहानियाँ हैं. उनमें कोई सच्चाई नहीं है. शिकायतकर्ता एक वयस्क महिला है. ऐसा कैसे हो सकता है कि एक महिला के साथ कोई इतनी बार और इतने लंबे समय तक लगातार रेप करे."
जबकि केरल में पुलिस को जो शिकायत मिली है उसमें नन ने ये दावा किया है कि मई 2014 से लेकर सितंबर 2016 के बीच बिशप फ़्रैंको मुलक्कल ने कई बार उनका यौन शोषण किया.
किसी भी चर्च के धार्मिक अधिकार क्षेत्र में एक बिशप सबसे बड़ा पदाधिकारी होता है. भारत में इस वक़्त कुल 145 बिशप हैं.
इस मामले में जालंधर के बिशप का ये भी दावा है कि नन के ख़िलाफ़ एक अलग शिकायत में उन्होंने जाँच की थी जिसके बाद नन पर कार्रवाई भी हुई थी. उसी का बदला लेने के लिए वो ऐसा कर रही है.
इस बीच, केरल में नन महिलाओं के एक समूह ने इस मामले पर पुलिस की निष्क्रियता के ख़िलाफ़ सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन आयोजित किये हैं. वहीं दूसरी ओर, जालंधर स्थित संस्था मिशनरी ऑफ़ जीसस ने कोच्चि में सभी ननों से इन विरोध प्रदर्शनों में शामिल न होने का आग्रह किया है.
केरल में हुए विरोध प्रदर्शनों में कैथोलिक लैटिन चर्च के सदस्यों समेत कई स्थानीय लोगों ने भी हिस्सा लिया.
शिकायतकर्ता का कहना है कि 28 जून 2018 को पुलिस में शिकायत दर्ज कराने से पहले उन्होंने चर्च के बड़े अधिकारियों से बिशप फ़्रैंको मुलक्कल के ख़िलाफ़ बलात्कार के आरोपों की चर्चा की थी, लेकिन नन का आरोप है कि किसी ने उनकी नहीं सुनी.
शिकायतकर्ता नन का कहना है कि सार्वजनिक तौर पर विरोध प्रदर्शन करने से पहले उन्होंने जनवरी, जून और सितंबर में दिल्ली में बैठने वाले पोप के प्रतिनिधियों को भी चिट्ठी लिखी थी.
केरल कैथोलिक चर्च सुधार आंदोलन के जॉर्ज जोसेफ़ ने इस मामले में पुलिस की निष्क्रियता के ख़िलाफ़ केरल के उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी.
जब जोसेफ़ की याचिका पर कोर्ट में 10 अगस्त को सुनवाई हुई तब पुलिस ने कोर्ट को बताया था कि उसे नन के आरोपों के पक्ष में कुछ सबूत मिले हैं, जिसके बाद कोर्ट ने पुलिस को इस मामले में सावधानी से काम करने को कहा था.
जॉर्ज जोसेफ़ ने चार प्राथमिक बिंदुओं पर अदालत से निर्देश देने की प्रार्थना की है.
बीबीसी से बातचीत में जॉर्ज जोसेफ़ ने कहा, "हम चाहते हैं कि बिशप को जल्द से जल्द गिरफ़्तार किया जाये. इस मामले की पुलिस जाँच हाई कोर्ट की निगरानी में हो. बिशप फ़्रैंको मुलक्कल के विदेश यात्रा करने पर प्रतिबंध लगे और यौन दुर्व्यवहार के पीड़ितों के लिए गवाह सुरक्षा प्रोटोकॉल तैयार किया जाये."
वहीं अपने बचाव में बिशप फ़्रैंको मुलक्कल कहते हैं कि नन का पारिवारिक जीवन काफ़ी पेचीदा रहा है. वो एक पुरुष के साथ रिलेशन में थीं जो अब भी उनका पति है. इस मामले की जाँच की जा रही थी. लेकिन पूछताछ से ध्यान भटकाने के लिए नन ने उनके ख़िलाफ़ आधारहीन आरोप लगा दिये.
कोच्चि में हुए एक विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाली सिस्टर अनुपमा इसका जवाब देती हैं. उनका कहना है, "यहाँ उल्टा पीड़िता के ख़िलाफ़ ही बेबुनियाद आरोप गढ़े जा रहे हैं. जब महिला ने अपना घर छोड़ दिया था तो उनका परिवार साथ कैसे हो सकता है. बिशप ने ही इस जोड़े पर दबाव बनाकर दोनों से एक पत्र पर हस्ताक्षर कराये थे."
इस बीच बिशप के ख़िलाफ़ हो रहे विरोध प्रदर्शनों को समाज के अन्य वर्गों का भी समर्थन प्राप्त हो रहा है.
इनके समर्थन में प्रदर्शन में शामिल केरल हाईकोर्ट के सेवानिवृत जज कमाल पाशा ने बीबीसी से कहा, "पुलिस को अब तक अभियुक्त को हिरासत में लेना चाहिए. हाईकोर्ट के सामने जाँच अधिकारी ने जो एफ़िडेविट दाख़िल किया है, उसके मुताबिक़ बिशप को हिरासत में लेने के लिए पर्याप्त सबूत हैं."
"मुझे लगता है कि इस मामले में नन का साथ देना चाहिए. वे लोग अभियुक्त को बचाने की कोशिश कर रहे हैं. उसने अभी तक अग्रिम ज़मानत की याचिका भी दाख़िल नहीं की है."
पेशे से वकील और चर्च सुधार आंदोलन की सदस्य इंदुलेखा जोसेफ़ कहती हैं, "समस्या ये है कि ना तो सरकार और विपक्ष, दोनों में से कोई भी इस मुद्दे पर बोल नहीं रहा है क्योंकि सबको वोट बैंक की राजनीति करनी है. लोगों को लगता है कि बिशप का मतदाताओं पर प्रभाव है."
सायरो मालाबार चर्च के पूर्व प्रवक्ता फ़ादर पॉल थेलाकाठ ने बताया है, "शर्मनाक चुप्पी है, नन की शिकायत को कई महीने बीत चुके हैं. उन्होंने पुलिस के पास भी शिकायत की थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई."
फ़ादर थेलाकाठ ने बताया, "कोई फ़ैसला नहीं सुना रहा है कि कौन सही है और कौन ग़लत. लेकिन चुप्पी पीड़ादायक है."
Monday, September 3, 2018
गुजरात में पानी-पूरी पर बैन का सच
गुजरात के वडोदरा में गोल-गप्पे पर
बैन लगाने की चर्चा सब जगह है. वडोदरा नगर निगम के ट्विटर हैंडल से हुए एक
ट्वीट से इसकी शुरुआत हुई.
ट्वीट में उन्होंने लिखा है - "वडोदरा
फ़ूड डिपार्टमेंट ने 50 पानीपूरी बनाए जाने वाली जगहों पर सरप्राइज़ चेकिंग
की. 4000 किलो पानी-पूरी, 3350 किलो आलू और चना और 1200 लीटर पानी-पूरी का
पानी ज़ब्त कर फेंका. शहर में दस्त और उल्टियों के मामलों की बढ़ती संख्या
को देखते हुए नगर निगम ने फ़ैसला लिया है कि इसकी बिक्री पर रोक लगाई
जाए." ज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक़, जुलाई के महीने में वडोदरा में 120
लोगों को दस्त और उल्टी की शिकायत की बात सामने आई थी. इसके बाद प्रशासन ने
ये कदम उठाया. मामला कितना गंभीर है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि हालात का जायज़ा लेने के लिए दिल्ली से नेशनल सेंटर फ़ॉर डिज़ीज़ कंट्रोल के दो सदस्य, जांच के लिए वडोदरा पहुंच गए. पिछले पांच दिनों से वो इलाके में सर्वे कर रहे हैं.
वडोदरा नगर निगम के इस ट्वीट के बाद गुजरातियों की तरफ़ से इस फ़ैसले पर तीखी प्रतिक्रिया आने लगी.
लेकिन वीएमसी के ऐलान के बाद कुछ लोगों ने ट्विटर पर लिखा "सरकार ने जितनी तत्परता इस स्ट्रीट फ़ूड को बंद करने में दिखाई, काश उतनी तत्परता समस्या के समाधान में भी दिखाई होती."
कुछ लोगों ने इसे स्ट्रीट फ़ूड वालों के साथ अन्याय बताया है.
तो कुछ लोगों ने कहा कि नगर निगम वालों के इस फ़ैसले से ब्रांडेड पानी-पूरी बेचने वालों का फ़ायदा होगा.
इसके बाद वीएमसी के हेल्थ ऑफिसर डॉ मुकेश वैद्य ने बीबीसी को बताया, "वीएमसी ने ऐसी कई जगहों पर कार्रवाई की है जहां गंदे तरीक़े से तैयार की गई पानी-पूरी बिक रही थी. पानी-पूरी बेचने पर बैन नहीं है, लेकिन पानी-पूरी गंदे तरीक़े से बनाते और बेचते पाए गए तो उन दुकानदारों और स्ट्रीट फ़ूड वालों पर सख़्त कार्रवाई होगी."
जितनी मुंह उतनी बातें सामने आई. लेकिन क्या वाक़ई में गोल-गप्पे सेहत के लिए इतना ज़्यादा ख़तरनाक होता है?
इस सवाल के जवाब में डायटिशियन शालिनी सिंघल कहती हैं, "हमारे देश में लोगों का ये सबसे ज़्यादा पसंदीदा स्ट्रीट फ़ूड है. गोल-गप्पे खाने में कोई दिक्क़त नहीं है. गंदे तरीक़े से बनाए गए उसके पानी से तबियत ज़रूर बिगड़ सकती है. घर पर बनाकर इसे खाया जाए तो ये नुकसानदायक नहीं है. रोज़-रोज़ न खाए, कभी-कभार स्नैक्स के तौर पर इसका इस्तेमाल करें तो कोई दिक्क़त नहीं है."
दिल्ली में रहने वाली अपर्णा, डायटिशियन शालिनी की बात से पूरी तरह सहमत नहीं दिखती.
उनके मुताबिक, "गोल-गप्पे खाने का मज़ा तो गली-नुक्कड़ में लगे फुलकी वालों के यहां ही है. घर पर बनाए खाने में वो बात नहीं है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं की पानी ढका न हो, गोल-गप्पे प्लास्टिक से ढके न हों. इतना मैं ज़रूर देख लेती हूं. वडोदरा नगर निगम को बैन के बजाए इस बात पर ध्यान देना चाहिए था. "
गुजरात मे गोल-गप्पे की बिक्री के तीन तरीक़े हैं. इस धंधे में कुछ छोटे व्यापारी हैं तो कुछ ब्रांडेड नाम भी शामिल हैं.
ब्रांडेड गोल-गप्पे बनाने वालों को इस धंधे पर सलाह देने वाले संजय चक्रवर्ती कहते हैं, "कुछ लोग गोल-गप्पे घर में बनाते हैं और पानी भी घर पर बनाते हैं. गुजरात के वडोदरा शहर में ऐसे व्यापारियों की संख्या ज़्यादा है. ऐसे लोग इस धंधे में 75 फ़ीसदी लागत से ज़्यादा कमाते हैं. लेकिन कुछ व्यापारी गोल-गप्पे बाहर से ख़रीदते हैं और पानी घर पर बनाते हैं. ऐसे व्यापारियों को इस धंधे में 50 फ़ीसदी का फ़ायदा होता है."
दिल्ली में गोल-गप्पों को ब्रांडेड नाम से बेचने वाले एक व्यापारी गिरिश ने बीबीसी को बताया, "हम किसी एक खाने के प्रोडक्ट पर फ़ायदा-नुक़सान नहीं जोड़ते. खाने की दुकान है, लोगों के टेस्ट के हिसाब से सब कुछ रखना पड़ता है. गोल-गप्पे भी उसी का हिस्सा है. हम तो इस बात का विशेष ख्याल रखते हैं कि हमारे यहां हर खाने में इस्तेमाल होने वाली हर चीज़ सेहतमंद हो. फिर चाहे वो गोल-गप्पे का पानी ही क्यों न हो."
वैसे गोल-गप्पे को अलग-अलग नाम से पूरे देश में जाना जाता है. बंगाल में फुचका, गुजरात और महाराष्ट्र में कई जगह पानी-पूरी, मध्य प्रदेश में पानी बताशा, उत्तर प्रदेश में फुलकी, बिहार में गुपचुप, महाराष्ट्र में कई जगह इस बटाटा-पूरी के नाम से जाना जाता है.
डॉ. शालिनी के मुताबिक़ तीन गोल-गप्पे में एक रोटी जितनी कैलरी होती है, लगभग 70 कैलरी सूजी से बने और आटे से बने गोलगप्पे में कैलरी का बहुत ज्यादा अंतर नहीं होता.
इसका फ़ायदा कुछ नहीं होता सिवाय इसके कि 2-4 गोल-गप्पे में आपका पेट भर जाता है. लोग टेस्ट बड बदलने के लिए भी गोल-गप्पे खाते हैं.
डॉ. शालिनी के मुताबिक़, अमूमन सुबह-सुबह इसे कोई नहीं खाता. दोपहर या फिर शाम को हल्के स्नैक के तौर पर इसका इस्तेमाल करने में कोई बुराई नहीं है. समोसा और कचौड़ी के मुक़ाबले ये ज़्यादा सेहतमंद स्नैक है.
तो फिर नुकसानदायक कैसे? इस पर डॉक्टर का कहना है कि गोल-गप्पे में नमक का इस्तेमाल ज़्यादा होता है. इसलिए दिल की बीमारी, एडिमा (जिनके शरीर में पानी रुकने की दिक्कत होती है), किडनी की दिक्क़त वाले, हार्मोनल प्रॉब्लम वालों को गोल-गप्पे न खाने की सलाह दी जाती है.
इसके आलावा गोल-गप्पे का पानी बनाने में, साफ़ पानी का इस्तेमाल न किया जाए तो पेट से जुड़ी बीमारियों का ख़तरा ज़्यादा होता है जैसे दस्त, पीलिया, टाइफॉयड.
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